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Kota Bilaspur Kareel News: कोटा के जंगलों में प्रतिबंध के बाद भी करील की अंधाधुंध कटाई, बेलगहना-करही कछार बना हॉटस्पॉट, पर्यावरण पर संकट

बिलासपुर के कोटा विधानसभा में मानसून में प्रतिबंध के बाद भी बांस की करील की धड़ल्ले से बिक्री हो रही है। बेलगहना, करही कछार, कंचनपुर सहित 60 से ज्यादा वनांचल गांवों से जुड़े इस नेटवर्क पर वन विभाग और पुलिस की चुप्पी पर सवाल, केमिकल वाली करील से सेहत को खतरा।

कोटा के जंगलों में करील माफिया का कहर: प्रतिबंध को ठेंगा दिखाकर चल रहा है खेल, प्रशासन बेखबर!

कोटा, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले की कोटा विधानसभा, जो चारों तरफ से सतपुड़ा की पहाड़ियों और घने बांस के जंगलों से घिरी है, आज एक बड़े पर्यावरणीय संकट से जूझ रही है। मानसून, जो जंगल को नया जीवन देता है, वही अब जंगल की लूट का सीजन बन गया है। बांस की नई कोमल कोंपल यानी करील की अंधाधुंध और अवैध कटाई पूरे कोटा अंचल में जोरों पर है।

क्या है नियम और क्यों लगा है प्रतिबंध?

वन विभाग के नियमों के अनुसार 15 जून से 31 अगस्त तक बांस की करील काटना पूरी तरह से प्रतिबंधित होता है। यह समय बांस के प्राकृतिक पुनर्जनन (Natural Regeneration) का होता है। इसी कोंपल से 2-3 साल में एक पूरा नया बांस तैयार होता है। वन अधिनियम के तहत इस दौरान कटाई करने पर वन अपराध का केस और जेल तक का प्रावधान है। फिर सवाल उठता है कि जब कानून इतना सख्त है, तो बाजार में करील आ कहां से रही है?

बाजार में सरेआम बिक रही है करील, कीमत आसमान पर

कोटा मुख्य बाजार, बेलगहना बाजार, रतनपुर रोड और लोरमी रोड के सब्जी बाजारों में इन दिनों करील खुलेआम 80 से 150 रुपये किलो बिक रही है। मांग इतनी ज्यादा है कि सुबह 7 बजे तक पूरा स्टॉक खत्म हो जाता है। व्यापारियों के मुताबिक, आने वाले दिनों में इसकी कीमत 200 रुपये किलो तक पहुंच सकती है।

कोटा के ये वनांचल गांव सबसे ज्यादा संवेदनशील

कोटा तहसील में 152 राजस्व गांव हैं, जिनमें से ज्यादातर वन से लगे हुए हैं। वन विभाग की नजर में जो क्षेत्र सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं और जहां से लगातार दबाव की खबरें आ रही हैं, वे हैं:

बेलगहना, करही कछार, कंचनपुर, बछाली खुर्द, बांकिघाट, खुरदुर, रानीगांव, धूमा, कर्गी कला, कर्गी खुर्द, आमागोहन, अमाली, लिटिया, सिल्दहा, खरगहनी, चंगोरी, गोबरीपाट, केंवरापारा, जोगीपुर, करका, पीपरपारा, नवापारा, भैंसाझार, कुंआजती, सलका, मझगांव, लुफा, कोनचरा, कर्रा, करवा, कालीमटार, केनादांड, केन्दा, चपोरा, छतौना, दर्शनसागर, धनरास, डिंडोल, नागचुआ, रानी बछाली, पहाड़ बछाली, सेमरा, सेमरिया, शिवतराई, सिस, सोढ़ा कला, उमरमरा, तेंदुआ, लमकेना, बिल्लीबंद, परसापानी, पिपरतराई।

सूत्रों के अनुसार रात के 2 से 4 बजे के बीच इन वनांचलों में कटाई की जाती है और तड़के बाइकों और पिकअप से माल बाजारों में पहुंचा दिया जाता है।

इतना बड़ा नेटवर्क कैसे चल रहा है? फॉरेस्ट और पुलिस पर सवाल

1. फॉरेस्ट विभाग की गश्त पर सवाल: कोटा रेंज में स्टाफ की कमी का हवाला हमेशा दिया जाता है, लेकिन स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि क्या रोजाना क्विंटलों में हो रही निकासी की भनक तक विभाग को नहीं लगती? बीट सिस्टम फेल क्यों है?

2. पुलिस चेकिंग से कैसे बच रहा है माल? जंगल से बाजार तक आने के लिए मुख्य मार्गों से गुजरना ही पड़ता है। फिर बिना किसी रोक-टोक के ये माल कैसे निकल रहा है? क्या परिवहन करने वालों को पहले से ही रास्तों की जानकारी मिल रही है?

3. बाजार में कार्रवाई क्यों नहीं? जब सबको पता है कि करील प्रतिबंधित है, तो नगर प्रशासन और खाद्य विभाग खुले बाजार में बिक रही करील को जब्त क्यों नहीं कर रहा?

स्थानीय लोगों का कहना है “बिना अंदरूनी मिलीभगत के रातों-रात इतना बड़ा खेल संभव नहीं है। अगर विभाग चाहे तो एक दिन में पूरा खेल बंद हो सकता है।”

 प्रकृति और सेहत दोनों पर दोहरी मार

पर्यावरण पर असर: एक करील काटने से सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि पूरा इकोसिस्टम खत्म होता है। बांस की जड़ें पहाड़ी मिट्टी को बांधकर रखती हैं। बांस खत्म होगा तो मिट्टी का कटाव, नदियों का सूखना और जंगली जानवरों का पलायन तय है।

सेहत पर जहर: सबसे खतरनाक बात यह है कि करील को 2-3 दिन तक ताजा दिखाने के लिए उसे चूने के घोल और अन्य केमिकल में डुबोया जा रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक ऐसी करील खाने से फूड प्वाइजनिंग, लिवर-इन्फेक्शन और किडनी डैमेज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

अब क्या होनी चाहिए कार्रवाई?

पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों ने जिला प्रशासन बिलासपुर से मांग की है:

• बेलगहना-करही कछार- कंचनपुर वन परिक्षेत्र में नाइट पेट्रोलिंग और ड्रोन सर्विलांस शुरू हो।

• बाजार में बिक रही करील के सैंपल लेकर फूड सेफ्टी विभाग जांच करे।

• अवैध कटाई के पूरे नेटवर्क की जांच के लिए एक संयुक्त टीम बने। 

अगर समय रहते नहीं चेता गया तो आने वाले 5 सालों में कोटा की पहचान रहे घने बांस के जंगल सिर्फ कहानियों में रह जाएंगे।

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