बिलासपुर बिल्हा ग्राम गुमा सहकारी समिति 3.38 लाख गबन कांड, धान खरीदी 15 नवंबर से 31 जनवरी तक मौजूद थे प्राधिकृत अधिकारी फिर भी 14 महीने तक नहीं दिखा घोटाला, ओवरराइटिंग प्रमाणित
बिलासपुर जिले के बिल्हा तहसील के ग्राम गुमा सेवा सहकारी समिति क्रमांक 63 में 3 लाख 38 हजार रुपये का गबन, थाना बिल्हा में एफआईआर 0512/2026 दर्ज, चेक में कांट छांट प्रमाणित, प्रबंधक शरद कुमार कश्यप का हस्ताक्षर, प्राधिकृत अधिकारी राजकुमार बरगाह की 14 महीने की चुप्पी, धान खरीदी के दौरान मौजूदगी पर सवाल।

बिलासपुर के बिल्हा में बड़ा घोटाला : ग्राम गुमा सहकारी समिति में 3.38 लाख का गबन, धान खरीदी केंद्र में मौजूद थे अधिकारी फिर भी 14 महीने तक चुप्पी

बिलासपुर / बिल्हा / गुमा :- जिला बिलासपुर के बिल्हा विकासखंड के ग्राम गुमा सेवा सहकारी समिति क्रमांक 63 में 3 लाख 38 हजार रुपये के गबन का मामला अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है। थाना बिल्हा में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट क्रमांक 0512/2026 की प्रमाणित कॉपी और चेक में हुई कांट छांट के सबूत सामने आने के बाद कई बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
एफआईआर में क्या लिखा है
जिला बिलासपुर, थाना बिल्हा, घटना स्थल ग्राम गुमा सेवा सहकारी समिति। एफआईआर क्रमांक 0512/2026, दिनांक 26 सितंबर 2026 शाम 6 बजकर 3 मिनट। शिकायतकर्ता राजकुमार बरगाह पिता दूजी राम बरगाह निवासी ग्राम हथनी, प्राधिकृत अधिकारी सह अध्यक्ष। आरोपी 1. शरद कुमार कश्यप संस्था प्रबंधक, 2. हितेश सलूजा सुपरवाइजर, 3. लक्ष्मण कौशिक शाखा प्रबंधक जिला सहकारी बैंक शाखा बिल्हा। बैंक खाता क्रमांक 606010098790। धारा भारतीय न्याय संहिता 318(4), 336(2)(3), 338, 340(2), 3(5)।
3 लाख 14 हजार को 6 लाख 52 हजार कैसे बनाया
समिति के प्रस्ताव में स्वीकृत राशि 3 लाख 14 हजार 50 रुपये थी। चेक क्रमांक 016635 दिनांक 19 जुलाई 2025 को 80 हजार 150 रुपये, चेक क्रमांक 021914 दिनांक 15 सितंबर 2025 को 51 हजार 900 रुपये, चेक क्रमांक 021019 दिनांक 14 अक्टूबर 2025 को 1 लाख 82 हजार 80 रुपये। आरोप है कि इसे काटकर 6 लाख 52 हजार 50 रुपये बना दिया गया। 80 हजार 150 को 2 लाख 80 हजार 150, 51 हजार 900 को 89 हजार 900 और 1 लाख 82 हजार 80 को 2 लाख 82 हजार 80 रुपये बनाया गया। अंतर 3 लाख 38 हजार रुपये। एफआईआर में लिखा है कि इस अधिक राशि का एक भी खर्च बिल रिकॉर्ड में नहीं है।
ओवरराइटिंग प्रमाणित और प्रबंधक का हस्ताक्षर मौजूद
इस केस का सबसे बड़ा सबूत यही है कि चेकों में जो कांट छांट हुई है वह प्रमाणित है और उस पर संस्था प्रबंधक शरद कुमार कश्यप का हस्ताक्षर मौजूद है।
प्राधिकृत अधिकारी का बयान ही सवालों में
एफआईआर में प्राधिकृत अधिकारी का बयान है कि जब से वे अध्यक्ष पद पर आए हैं नियमित रूप से संस्था में आते जाते हैं और दस्तावेजों का अवलोकन करते हैं। बिना प्राधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर के बैंक से पैसा निकल ही नहीं सकता। कार्यवाही पंजी में प्रबंधक और प्राधिकृत अधिकारी दोनों के हस्ताक्षर के बाद ही पैसा निकलता है।
धान खरीदी वाला सबसे बड़ा मुद्दा
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी 15 नवंबर 2025 से 31 जनवरी 2026 तक चली। इस पूरे समय प्राधिकृत अधिकारी धान खरीदी केंद्र ग्राम गुमा में ही मौजूद थे। रोज बैंक से लेन देन, रोज किसानों को भुगतान। जब वे रोज केंद्र में मौजूद थे तो जुलाई 2025 वाला पुराना गबन कार्यवाही पंजी में क्यों नहीं देखा। धान खरीदी खत्म होने के 7 महीने बाद अचानक घोटाला क्यों याद आया। पहले क्यों याद नहीं आया।
14 महीने का सही हिसाब
एफआईआर 26 सितंबर 2026 को दर्ज हुई। 19 जुलाई 2025 वाले चेक से 14 महीना 7 दिन का अंतर, 15 सितंबर 2025 वाले चेक से 12 महीना 11 दिन और 14 अक्टूबर 2025 वाले चेक से 11 महीना 12 दिन का अंतर। अंकेक्षण मार्च अप्रैल 2026 में होने के बाद भी 24 सितंबर 2026 को प्रस्ताव क्यों।
मृत प्रबंधक पर एफआईआर कैसे
पक्की जानकारी के अनुसार प्रबंधक शरद कुमार कश्यप की मृत्यु एफआईआर से एक महीना पहले अगस्त 2026 में हो चुकी है। कानून में मृत व्यक्ति पर मुकदमा नहीं चलता। फिर मृत व्यक्ति को मुख्य आरोपी बनाकर एफआईआर क्यों दर्ज की गई। चर्चा है कि अपनी गलती छुपाने के लिए मृत पर दोष डाला जा रहा है।
बैंक की भूमिका
जिला सहकारी बैंक शाखा बिल्हा के सुपरवाइजर और शाखा प्रबंधक ने कांट छांट वाले चेक कैसे पास कर दिए। यह बैंकिंग नियमों का गंभीर उल्लंघन है।
जांच में क्या होना चाहिए
पुलिस को कार्यवाही पंजी, तीनों मूल चेक, बैंक खाता 606010098790 का लेन देन, धान खरीदी अवधि 15 नवंबर 2025 से 31 जनवरी 2026 का रिकॉर्ड जब्त कर फॉरेंसिक जांच करानी चाहिए। प्राधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर की जांच, मृत्यु प्रमाण पत्र का सत्यापन और अंकेक्षक का बयान जरूरी है।
निष्कर्ष
पैसा बिना प्राधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर के नहीं निकल सकता। कार्यवाही पंजी पर भी उनका हस्ताक्षर होता है। धान खरीदी के दौरान वे मौजूद थे फिर भी पुराना गबन नहीं देखा। इसलिए प्रतीत होता है कि प्राधिकृत अधिकारी अपनी गलती छुपाने के लिए दूसरों पर दोष लगा रहे हैं। इसकी पूरी जांच होनी चाहिए।




