Bilaspur Masturi Road News: बकरकुदा-मटिया 7KM मौत का रास्ता, सरपंच-जनपद सदस्य-विधायक मौन
बिलासपुर मस्तूरी के बकरकुदा-मटिया में 7KM सड़क 25 साल से बदहाल, सरपंच, जनपद सदस्य, विधायक दिलीप लहरिया पर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा। ग्राउंड रिपोर्ट

बिलासपुर में विकास के दावे कीचड़ में लोट-पोट: बकरकुदा-मटिया का 7 KM मौत का रास्ता, सरपंच, जनपद सदस्य से लेकर विधायक तक सब मौन, ग्रामीणों ने कहा – अब बहुत हुआ!

ग्राउंड रिपोर्ट – मटिया / बकरकुदा, मस्तूरी, बिलासपुर – छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी जमीनी हकीकत
छत्तीसगढ़ सरकार भले ही गांव-गांव में विकास का ढोल पीट रही हो, टीवी-पोस्टर, बैनर और मंच से विकास की गंगा बहाने का दावा कर रही हो, लेकिन बिलासपुर जिले के सबसे बड़े विधानसभा क्षेत्र मस्तूरी में विकास की हकीकत देखनी है तो बकरकुदा से मटिया जाने वाले 7 किलोमीटर के रास्ते पर आइए। यहां सड़क नहीं, मौत का गड्ढा है, नरक का हाईवे है। तस्वीर नहीं बदल रही तो तकदीर क्या बदलेगी? यहां विकास आया ही नहीं, सिर्फ वादे आए और वादे भी कीचड़ में धंस कर मर गए!
आज़ादी के 79 साल बाद भी गड्ढों में जीने को मजबूर ग्रामीण – सबसे शर्मनाक तस्वीर
यह कोई एक-दो दिन की कहानी नहीं है, यह दशकों के धोखे और छलावे की दास्तान है। ग्रामीणों के मुताबिक इस सड़क को बने हुए 20 से 25 साल हो चुके हैं। तब से इस पर एक बार भी डामर तक नहीं लगा। सोचिए, 25 साल में एक सड़क पर एक बार भी डामरीकरण नहीं! आज हालत यह है कि पूरी सड़क तालाब बन चुकी है। ये सड़क नहीं, धान का खेत ज्यादा लगती है। बरसात में तो गड्ढे और पानी में फर्क ही नहीं दिखता। 3 से 4 फीट गहरे गड्ढे मुंह फाड़े खड़े हैं, जैसे किसी ने मौत के जाल बिछा दिए हों। लोग अंदाजा नहीं लगा पाते और भर-भराकर गिर जाते हैं। मोटरसाइकिल फंस रही है, ट्रैक्टर ट्राली पलटने की नौबत आ रही है, साइकिल वाले गिर रहे हैं, महिलाएं और बच्चे कीचड़ में लथपथ होकर स्कूल और बाजार जाने को मजबूर हैं। किसी की हड्डी टूट रही है, किसी की गाड़ी टूट रही है। एम्बुलेंस तो इस रास्ते पर आने से भी कतराती है, अगर रात में किसी की तबीयत बिगड़ जाए तो भगवान ही मालिक है। सरकार बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन इस गांव में तो आजादी के 79 साल बाद भी लोग 19वीं सदी वाली जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
दो ग्राम पंचायत, दो सरपंच, लेकिन काम जीरो? कुर्सी का सुख, गांव दुखी!
सबसे बड़ा सवाल यहीं उठता है और यही इस खबर की सबसे बड़ी चोट है। यह सड़क दो ग्राम पंचायतों – बकरकुदा ग्राम पंचायत और मटिया ग्राम पंचायत को जोड़ती है। अगर दोनों पंचायतों के सरपंच चाहें, एक प्रस्ताव बना दें, एक बार जनपद में जाकर टेबल ठोक दें तो क्या यह सड़क नहीं बन सकती? बिल्कुल बन सकती है!
लेकिन ग्रामीणों का सीधा और तीखा आरोप है कि सरपंचों ने कभी इस सड़क को अपनी प्राथमिकता में लिया ही नहीं। उन्हें पंचायत भवन चमकाना है, उन्हें अपने चहेतों को काम देना है, उन्हें नाली-नल का कमीशन खाना है, लेकिन गांव की लाइफलाइन सड़क से उन्हें क्या मतलब? पंचायत के पास लाखों-करोड़ों का फंड है, 15वें वित्त का पैसा है, प्रस्ताव बनाने का अधिकार है, सीसी रोड और डामर रोड का पूरा पावर है, लेकिन ध्यान कौन दे? ग्रामीण पूछ रहे हैं – क्या सरपंच सिर्फ चुनाव के समय ही गांव के बेटा बनते हैं? सरपंचों की इस घोर उदासीनता और निकम्मेपन के कारण आज पूरा गांव नरक भुगत रहा है। अगर सरपंच ही गांव की मुख्य सड़क के लिए आवाज नहीं उठाएगा तो गांव का विकास कैसे होगा? ये सरपंच हैं या सिर्फ मुखौटा?
जनपद सदस्य से लेकर विधायक तक पर फूटा गुस्सा – वोट चाहिए, विकास नहीं!
ग्रामीणों का गुस्सा सिर्फ सरपंच तक सीमित नहीं है, ये गुस्से का लावा अब पंचायत से लेकर जनपद और विधानसभा तक पहुंच गया है।
ग्रामीणों ने कैमरे पर फूट-फूट कर अपना दर्द कहा
“यहां कोई नहीं आता। भाजपा की सरकार है, पर हमारी कोई सुध नहीं लेता। सरकार कहती है सब खुश हैं, सबका साथ सबका विकास, आप आकर देखिए हम कितने खुश हैं। हम कीचड़ में खुश हैं, गड्ढों में खुश हैं!”
बुजुर्गों ने तो सिस्टम की पोल खोलते हुए यहां तक कह दिया – “हमने तो विधायक दिलीप लहरिया को इस सड़क पर कभी देखा ही नहीं। सिर्फ वोट मांगने आते हैं, हाथ जोड़ते हैं, पैर पड़ते हैं। जीतने के बाद AC वाली गाड़ी में घूमते हैं, हमारे गांव की तरफ झांकते भी नहीं।”
और सबसे बड़ा हमला जनपद सदस्य पर बोला गया। ग्रामीणों ने कहा – “हमारा जनपद सदस्य तो सबसे बड़ा गायब है। उसको तो हमने चुनाव के बाद शक्ल भी नहीं देखी। वो किस काम का जनपद सदस्य जो गांव की मुख्य सड़क के लिए एक प्रस्ताव तक नहीं रख सकता? जनपद में जाता है तो सिर्फ अपनी हाजिरी बजाता है। जिला पंचायत सदस्य भी कभी झांकने नहीं आता। चुनाव आता है तो हाथ जोड़ते हैं, चुनाव खत्म होते ही गायब हो जाते हैं, जैसे गधे के सिर से सींग!”
एक बुजुर्ग महिला ने तो रोते हुए कहा कि पैदल चलना भी दूभर हो गया है, गाड़ी की तो बात ही छोड़िए। “बेटा, हम गिर जाते हैं, घुटने छिल जाते हैं। बहू-बेटियां कैसे जाएं? कोई सुनने वाला नहीं है। सरपंच सुनता नहीं, जनपद सदस्य दिखता नहीं और विधायक आता नहीं। हम जाएं तो जाएं कहां?”
सबसे ज्यादा मार स्कूली बच्चों और महिलाओं पर – भविष्य कीचड़ में लोट रहा है
इस बदहाल सड़क की सबसे बड़ी मार छोटे-छोटे स्कूली बच्चों और महिलाओं पर पड़ रही है, और यही सबसे दर्दनाक है। बच्चे रोज इसी कीचड़ भरे गड्ढों वाले रास्ते से स्कूल जाते हैं। सफेद यूनिफॉर्म पहनकर निकलते हैं और कीचड़ में काले होकर स्कूल पहुंचते हैं। कई बार फिसलकर गिर जाते हैं, किताबें-कपड़े खराब हो जाते हैं, चोट लग जाती है। कई बच्चे तो बरसात में स्कूल जाना ही बंद कर देते हैं। क्या यही पढ़ेगा-लिखेगा छत्तीसगढ़ है? क्या यही सुशासन है?
महिलाओं को बाजार, अस्पताल जाने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। गर्भवती महिलाओं को इसी मौत के रास्ते से अस्पताल ले जाना पड़ता है, सोचिए कितना बड़ा खतरा है। एक छोटी सी बीमारी में भी आदमी आधे रास्ते में ही दम तोड़ दे।
सीधा सवाल प्रशासन से – पैसा हजम या विकास खत्म? कौन है जिम्मेदार?
आखिर इस 7 किलोमीटर के टुकड़े के लिए जिम्मेदार कौन है? ग्राम पंचायत बकरकुदा, ग्राम पंचायत मटिया, जनपद पंचायत मस्तूरी के जनपद सदस्य, जिला पंचायत बिलासपुर और क्षेत्रीय विधायक – सभी की जिम्मेदारी बनती है। करोड़ों रुपये का बजट हर साल आता है, जाता कहां है? क्या दीमक खा जाती है? क्या फाइलों में ही सड़क बन जाती है? कागजों में तो सड़क तीन बार बन चुकी होगी, पर जमीन पर आज भी 25 साल पुराना गड्ढा है।
ग्रामीणों की चेतावनी – अब उग्र आंदोलन होगा
ग्रामीणों ने अब दो टूक चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही इस सड़क का निर्माण शुरू नहीं हुआ तो वे उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे। चक्का जाम होगा, कलेक्टरेट का घेराव होगा और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों – सरपंच से लेकर जनपद सदस्य और विधायक तक का गांव में घुसना बंद कर दिया जाएगा।
अब देखना होगा कि इस डबल तड़के वाली रिपोर्ट के बाद जिम्मेदारों की नींद खुलती है या फिर ग्रामीण ऐसे ही 79 साल की आजादी के बाद भी कीचड़ में रहने, गड्ढों में गिरने और नेताओं के झूठे वादे सुनने को मजबूर रहेंगे।



