Sarangarh Bilaigarh Breaking:-बरमकेला में 16वें वित्त पर घमासान, 10 सदस्यों के बहिष्कार से पारित हुई योजना
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के बरमकेला जनपद पंचायत में 16वें वित्त आयोग की कार्ययोजना पर बवाल। 10 जनपद सदस्यों के बहिष्कार के बाद बहुमत से प्रस्ताव पारित, क्षेत्र से बाहर कार्य और कमीशन के आरोपों पर सियासत गरम।

सारंगढ़-बिलाईगढ़: बरमकेला जनपद पंचायत में 16वें वित्त आयोग की कार्ययोजना पर महाभारत, 10 सदस्यों के वॉकआउट के बाद बहुमत से पारित हुआ प्रस्ताव, वित्त मंत्री तक पहुंचा मामला

बहुमत से प्रस्ताव पारित, विरोध करने वाले सदस्यों की भूमिका पर सवाल; क्षेत्र से बाहर कार्य स्वीकृति और कमीशन के आरोपों से गरमाई सियासत

बरमकेला, सारंगढ़-बिलाईगढ़। छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले की बरमकेला जनपद पंचायत इन दिनों सियासी भूचाल के केंद्र में है। वजह है 16वें वित्त आयोग की करोड़ों की कार्ययोजना। जिस योजना को गांव-गांव में विकास की नई लकीर खींचनी थी, वही अब सत्ता और वर्चस्व की जंग बन गई है। बैठक में भाजपा समर्थित बताए जा रहे 10 जनपद सदस्यों के अचानक बैठक से वॉकआउट कर जाने के बाद मौजूद सदस्यों के बहुमत के आधार पर कार्ययोजना का प्रस्ताव पारित किए जाने की बात सामने आई है। अब इसी मामले को लेकर जनपद अध्यक्ष डा. विद्या किशोर चौहान के नाम से वित्त मंत्री ओपी चौधरी के समक्ष शिकायत किए जाने की चर्चा से जिले की राजनीति गरम हो गई है।

लोकतंत्र के मंच पर क्यों नहीं लड़ी लड़ाई? बहिष्कार पर उठा सबसे बड़ा सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कार्ययोजना में आपत्ति थी तो बैठक में मौजूद रहकर बिंदुवार विरोध क्यों नहीं किया गया? लोकतांत्रिक व्यवस्था में बैठक का मंच ही अपनी बात रखने और प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज कराने का माध्यम है। दस्तावेज और तथ्यों के साथ विरोध दर्ज कराया जा सकता था।
ऐसे में बैठक से बाहर चले जाने के बाद बहुमत से प्रस्ताव पारित होना अब पूरे मामले को और विवादित बना रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बाहर निकलने से विरोध दर्ज नहीं होता बल्कि सत्ता पक्ष को फ्री हैंड मिल जाता है।

‘कोरम का खेल’ पहले से तय था? 3 सदस्यों की सदस्यता पर भी संकट
बताया जा रहा है कि इससे पहले भी इन्हीं 10 जनपद सदस्यों द्वारा बैठक में कोरम पूरा नहीं होने देने की मंशा से कोरम पूर्ति का हवाला देते हुए बैठक में शामिल नहीं होने की स्थिति बनी थी।
वहीं एक और विस्फोटक तथ्य सामने आया है कि तीन जनपद सदस्यों के लगातार तीन बैठकों में अनुपस्थित रहने के बावजूद उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई हुई या नहीं, यह भी सवालों के घेरे में है। पंचायती राज अधिनियम के तहत लगातार अनुपस्थिति पर सदस्यता खत्म होने का प्रावधान है, लेकिन उन्हें नोटिस तक नहीं दिया गया।
‘अपने गांव से ज्यादा दूसरे के गांव में प्यार’ – क्षेत्र से बाहर कार्य का खेल और कमीशन के आरोप
विवाद की सबसे बड़ी चिंगारी है ‘क्षेत्र से बाहर कार्य स्वीकृति’। आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ जनपद सदस्यों द्वारा अपने क्षेत्र के बजाय दूसरे क्षेत्रों की ग्राम पंचायतों में कार्ययोजना की राशि प्रस्तावित की गई है। इससे संबंधित क्षेत्र की जनता के हिस्से के विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
इसी को लेकर कथित ‘कमीशनखोरी’ के आरोपों ने आग पकड़ ली है। आरोप है कि दूसरे क्षेत्र में काम प्रस्तावित करने के पीछे कमीशन का खेल हो सकता है। हालांकि, कमीशन लिए जाने के आरोपों की स्वतंत्र जांच के बाद ही सच्चाई सामने आ सकती है। इसलिए अब सवाल यह है कि कार्ययोजना में किस जनपद सदस्य के क्षेत्र की कितनी राशि, किस ग्राम पंचायत में और किस आधार पर प्रस्तावित की गई है?
CEO की भूमिका पर भी सवाल, पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग
पूरे विवाद में जनपद पंचायत बरमकेला की मुख्य कार्यपालन अधिकारी की भूमिका भी सवालों के घेरे में बताई जा रही है। कार्ययोजना तैयार करने से लेकर सदस्यों की आपत्तियों, बैठक की प्रक्रिया, अनुपस्थित सदस्यों और प्रस्ताव पारित होने तक की पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
खासकर यह स्पष्ट होना चाहिए कि बैठक में कितने सदस्य उपस्थित थे, कितने सदस्यों ने प्रस्ताव का समर्थन किया, किस सदस्य ने विरोध किया और किन जनपद सदस्यों ने बैठक का बहिष्कार किया।
मंत्री ने कहा – ‘मिलकर चलो’, लेकिन सवाल बरकरार
विवाद को लेकर वित्त मंत्री ओपी चौधरी के समक्ष शिकायत पहुंचने की बात सामने आई है। मंत्री की ओर से सभी को मिलकर चलने की बात कहे जाने की चर्चा है। लेकिन अब सवाल यह है कि जब विकास की कार्ययोजना पर चर्चा का अवसर बैठक में मौजूद था, तब विरोध करने वाले सदस्य बैठक से बाहर क्यों चले गए?
जनता ने जनपद सदस्यों को क्षेत्र के विकास के लिए चुना है। ऐसे में यदि किसी कार्ययोजना में गड़बड़ी या पक्षपात है तो उसे बैठक के भीतर दस्तावेज और तथ्यों के साथ सामने रखना चाहिए। सिर्फ बैठक का बहिष्कार करने से सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि सवाल और गहरे हो जाते हैं।
बहिष्कार करने वाले 10 जनपद सदस्यों की कार्ययोजना – किसने कहां दिया पैसा?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार विरोध करने वाले सदस्यों द्वारा प्रस्तावित कार्ययोजना इस प्रकार है
आनंद सा – लुकापारा में ढाई लाख, ठेंगागुड़ी में 2 लाख, सांकारा में 2 लाख
विश्वदेव भोई – पूरेनपाली में 4 लाख, डोंगरीपाली में ढाई लाख
अनिता प्रधान – भठली में 2 लाख, सुरसी में ढाई लाख और पोरथ में 2 लाख
तुलसी पटेल – शकरतूंगा में 2 लाख 40 हजार, धौरा दरहा में 2 लाख, बीजामाला में 2 लाख
लक्ष्मी चरण सिदार – झाल में 2 लाख 20 हजार, हट्टापाली में 2 लाख 20 हजार, छेलभांठा तरकेला पंचायत में 2 लाख
राधा सिदार – डभरा में 6 लाख 40 हजार
कौशल्या नायक – बार में 6 लाख 20 हजार
रजनी एक्का – डभरा में 2 लाख 40 हजार, दूसरे क्षेत्र पिपरखूंटा में 2 लाख, दूसरे क्षेत्र तरकेला पंचायत के छेलभांठा में 2 लाख
चंदा मिरि – गोबरसिंहा में 5 लाख 20 हजार, कतंगपाली अ में 60 हजार, मूंगलिपाली में 60 हजार
गणेशी चौहान – नावापाली में एक लाख, सिंघारी में 2 लाख, दूसरे क्षेत्र बोरे पंचायत में एक लाख, दूसरे क्षेत्र डुमरपाली में 2 लाख 40 हजार
दीपमाला जांगड़े – कंडोला में 4 लाख, जलगढ़ में 2 लाख 40 हजार
इस सूची में रजनी एक्का और गणेशी चौहान द्वारा दूसरे क्षेत्र में कार्य प्रस्तावित करना सबसे ज्यादा चर्चा में है।
अब जरूरत है कि पूरी कार्ययोजना सार्वजनिक हो, प्रत्येक जनपद सदस्य के क्षेत्र में स्वीकृत कार्यों की सूची सामने आए और क्षेत्र से बाहर प्रस्तावित कार्यों का आधार भी स्पष्ट किया जाए। बरमकेला में अब लड़ाई सिर्फ 10 बनाम 15 की नहीं, बल्कि सवाल यह है कि विकास की राशि का फैसला किस आधार पर हुआ और उसका वास्तविक लाभ किस क्षेत्र की जनता को मिलेगा?