Kota Bilaspur News: जोगीपुर गौ अभयारण्य 1.29 करोड़ विवाद, PWD से पंचायत को जिम्मा
बिलासपुर के कोटा जोगीपुर में 1.29 करोड़ के गौ अभयारण्य निर्माण में एजेंसी बदली। PWD से लेकर पंचायत को दिया जिम्मा, गुणवत्ता पर उठे सवाल। करेक्टर संजय अग्रवाल का औचक निरीक्षण।

कोटा (बिलासपुर): जोगीपुर में 1.29 करोड़ के गौ अभयारण्य का जिम्मा PWD से छीनकर पंचायत को, निर्माण की गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल कलेक्टर संजय अग्रवाल का औचक निरीक्षण

बिलासपुर/कोटा :- छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के कोटा विकासखंड के ग्राम जोगीपुर में प्रस्तावित बहुप्रतीक्षित गौ अभयारण्य का निर्माण कार्य अब एक बड़े विवाद में फंस गया है। शासन की ओर से 1.29 करोड़ रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति मिलने और लोक निर्माण विभाग (PWD) को निर्माण एजेंसी बनाए जाने के बाद अचानक एजेंसी बदलकर काम पंचायत को सौंप दिए जाने से न सिर्फ प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं, बल्कि निर्माण की गुणवत्ता, पारदर्शिता और समय-सीमा को लेकर भी गंभीर आशंकाएं जताई जा रही हैं।

बिलासपुर जोगीपुर गौ अभयारण्य विवाद: क्या है पूरा मामला?
राज्य शासन की मंशा थी कि बिलासपुर जिले में सड़कों पर घूम रहे आवारा मवेशियों की समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाए। इसी उद्देश्य से ग्राम जोगीपुर में 58 एकड़ शासकीय भूमि पर एक सर्वसुविधायुक्त आधुनिक गौ अभयारण्य स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए शासन द्वारा कुल 1.29 करोड़ रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की गई थी।
योजना के प्रथम चरण के तहत लोक निर्माण विभाग (PWD) संभाग-1, बिलासपुर द्वारा विस्तृत प्राक्कलन तैयार किया गया। प्राक्कलन में बारबेड वायर फेंसिंग, चार बड़े पशु शेड, चारा भंडार कक्ष और पशु चिकित्सालय भवन का निर्माण शामिल था। इस कार्य के लिए 71.43 लाख रुपये का प्राक्कलन स्वीकृत कर कलेक्टर कार्यालय, बिलासपुर से राशि भी PWD को अंतरित कर दी गई थी।
PWD से छीनकर जनपद पंचायत कोटा को दिया गया काम

सूत्रों के अनुसार, PWD द्वारा निर्माण कार्य शुरू करने के लिए जिला प्रशासन से कई बार पत्राचार किया गया, लेकिन आवश्यक अनुमति और कार्यादेश में देरी होती रही। इसी बीच 17 अगस्त को एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में PWD विभाग ने फेंसिंग कार्य हेतु स्वीकृत 12.28 लाख रुपये की राशि का चेक जनपद पंचायत कोटा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) को सौंप दिया।
बताया जा रहा है कि अब शेष निर्माण कार्य भी पंचायत के माध्यम से कराए जाने की तैयारी है। तकनीकी रूप से दक्ष PWD जैसे विभाग की जगह पंचायत को निर्माण एजेंसी बनाए जाने के निर्णय ने सभी को चौंका दिया है।
पहले मनरेगा के 40 लाख के कार्यों की गुणवत्ता पर भी उठे थे सवाल

यह पहला मौका नहीं है जब जोगीपुर गौ अभयारण्य के निर्माण पर सवाल उठे हों। जानकारी के अनुसार, इससे पहले भी गौ अभयारण्य परिसर में पंचायत स्तर से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) मद के तहत लगभग 40 लाख रुपये के विभिन्न कार्य कराए गए थे।
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि उन कार्यों में भारी अनियमितता बरती गई और निर्माण की गुणवत्ता बेहद निम्न स्तर की रही। बाउंड्रीवॉल में दरारें, शेड का कमजोर स्ट्रक्चर और अधूरे कार्यों को लेकर पहले भी शिकायतें सीएम हेल्पलाइन और जिला प्रशासन तक पहुंची थीं। ऐसे में अब दोबारा उसी पंचायत व्यवस्था को बड़ी राशि का जिम्मा सौंपे जाने से निगरानी और गुणवत्ता को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की जा रही है।
जोगीपुर गौ अभयारण्य: प्रस्तावित कार्य एवं स्वीकृत बजट

विभागीय दस्तावेजों के अनुसार, गौ अभयारण्य में निम्नलिखित प्रमुख निर्माण कार्य प्रस्तावित हैं:
• पशु शेड निर्माण (4 नग) – 37.20 लाख रुपये
• बारबेड वायर फेंसिंग (58 एकड़ क्षेत्र में) – 12.28 लाख रुपये
• चारा भंडार कक्ष का निर्माण – 12.65 लाख रुपये • पशु चिकित्सक कक्ष / पशु चिकित्सालय निर्माण – 9.30 लाख रुपये
• PWD को अंतरित कुल राशि – 71.43 लाख रुपये • परियोजना की कुल प्रशासकीय स्वीकृति – 1.29 करोड़ रुपये छत्तीसगढ़
गौ सेवा आयोग अध्यक्ष धीरेंद्र दुबे ने जताई नाराजगी
पूरे मामले पर छत्तीसगढ़ राज्य गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष धीरेंद्र दुबे ने कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि तकनीकी विभाग से प्राक्कलन तैयार कराने के बाद एजेंसी बदलना नियमों के विरुद्ध है।
उन्होंने कहा:
“सड़कों पर घूम रहे मवेशियों के समुचित व्यवस्थापन के लिए जोगीपुर में सर्वसुविधायुक्त गौ अभयारण्य का निर्माण हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता में है। आयोग ने मानक प्राक्कलन के आधार पर राशि जारी की है। PWD द्वारा प्राक्कलन तैयार करने और राशि जारी होने के बाद एजेंसी बदलना पूरी तरह गलत है। निर्माण की गुणवत्ता और समय-सीमा से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। इस मामले की जांच कराई जाएगी।”
हाई कोर्ट में विचाराधीन हैं तीन जनहित याचिकाएं
गौरतलब है कि प्रदेश में सड़कों पर घूम रहे आवारा मवेशियों के कारण हो रही सड़क दुर्घटनाओं और फसलों को हो रहे नुकसान को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में तीन जनहित याचिकाएं (WPIL 58/2019, 63/2019 व 25/2026) विचाराधीन हैं।
माननीय न्यायालय ने इस मामले में कई बार कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य शासन को मवेशियों के समुचित व्यवस्थापन के लिए ठोस कार्ययोजना प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में भी बिलासपुर जिले से सड़कों पर मवेशियों को लेकर लगातार शिकायतें दर्ज हो रही हैं। इन्हीं कारणों से जोगीपुर गौ अभयारण्य का निर्माण शासन की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा गया था।
कोटा के ग्रामीणों और किसानों में आक्रोश
कोटा क्षेत्र के ग्रामीणों और पशुपालकों में इस घटनाक्रम को लेकर भारी आक्रोश है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल सैकड़ों सड़क हादसे आवारा मवेशियों के कारण होते हैं, जिसमें कई लोगों की जान भी चली जाती है। किसान अपनी फसलों को बचाने के लिए रात-रात भर खेतों में पहरा देने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि 1.29 करोड़ की बड़ी राशि का भी सही उपयोग नहीं हुआ और निर्माण गुणवत्ताहीन रहा, तो यह क्षेत्र की जनता के साथ बड़ा धोखा होगा। उन्होंने मांग की है कि निर्माण कार्य किसी तकनीकी विभाग से ही कराया जाए और हर चरण की थर्ड पार्टी जांच हो।
प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल, आगे क्या होगा?
फिलहाल जिला प्रशासन और जनपद पंचायत कोटा की ओर से इस एजेंसी परिवर्तन को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। PWD अधिकारियों ने भी इस विषय पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 58 एकड़ जैसे बड़े क्षेत्र में फेंसिंग, बड़े-बड़े शेड और चिकित्सालय जैसे तकनीकी निर्माण कार्यों के लिए PWD जैसी एजेंसी की तकनीकी निगरानी आवश्यक है। पंचायत स्तर पर तकनीकी अमले की कमी के कारण गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शासन की मंशा के अनुरूप जोगीपुर में एक आदर्श गौ अभयारण्य बन पाएगा, या यह परियोजना भी भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ जाएगी? आने वाले दिनों में गौ सेवा आयोग और हाई कोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।